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अयोध्या की रामजन्मभूमि राम की ही नहीं, भारत की सांस्कृतिक-सभ्यता की अविरल धारा का भी प्रतीक है

भगवान राम के जन्मस्थान पर मंदिर पुनर्निर्माण का आरंभ एक भवन या पूजास्थल का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि योगभूमि भारतवर्ष की सनातन संस्कृति और सभ्यता के पुनर्स्थापना का शुभारंभ है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि भारत की सांस्कृतिक सभ्यता विश्व की एकमात्र सभ्यता है, जिसका प्रवाह गंगा-प्रवाह अनुरूप अविरल और जीवंत रहा है। इसमें बार-बार व्यवधान आए जो इस अर्पण, समर्पण और तर्पण की संस्कृति और इस ज्ञान केंद्रित सभ्यता को विध्वंस की कगार पर ले गए, परंतु जब इस सभ्यता का ह्रास हुआ तब-तब भगवतकृपा से किसी महापुरुष का आविर्भाव हुआ जिसने शस्त्र या शास्त्र से धर्म की रक्षा की और इस सनातन सभ्यता का पुनरुद्धार किया।

हमारी संस्कृति का ध्वंस आंतरिक एवं वाह्य कारणों से होता रहा

कालांतर में हमारी संस्कृति का ध्वंस आंतरिक एवं वाह्य दोनों कारणों से होता रहा। आंतरिक कारणों में आस्था का बदलना जैसे सनातन से बौद्ध और फिर बौद्ध से सनातन, भाषा समयानुसार बदलना जैसे वैदिक संस्कृति से पाली और पाली से प्राकृत, ग्रंथों का खोया नष्ट हो जाना जैसे नालंदा के पुस्तकालय को जला देना आदि आते हैं। वाह्य कारणों में युद्ध आदि आते हैं। अन्य कारण हैं प्राकृतिक बदलाव। जैसे सरस्वती नदी का सूख जाना जिससे उसके किनारे रहने वाले वहां से कहीं और स्थापित हो गए। ऐसे परिवर्तनों से संस्कृति की शृंखला में अवसान हुआ-कभी दीर्घकालीन तो कभी थोड़े समय के लिए, लेकिन समाज या संस्कृति की मूल प्रकृति में परिवर्तन नहीं हुआ। अर्थात कारण बदले, तथ्य नहीं। साधन बदले, सिद्धांत नहीं।

भारत एशिया के समस्त देशों में अपने ज्ञान की धरोहर के कारण सम्मान का पात्र रहा

भारत एशिया के समस्त देशों में अपने ज्ञान की धरोहर के कारण गहन सम्मान का पात्र रहा। आज भी जापान, कोरिया, चीन, तिब्बत, रूस, कंबोडिया, लाओस, थाईलैंड, वियतनाम, म्यांमार, श्रीलंका में भारत शब्द को दर्शन एवं अध्यात्म का पर्याय माना जाता है। इन देशों में आज भी संस्कृति के शिलालेख, मूर्तियों के अवशेष, बौद्ध मंदिर और सनातन धर्म के मंदिर हैं। चीन में दूसरी शताब्दी का धर्मकीर्ति द्वारा स्थापित विशाल शाओलिन मंदिर है। कंबोडिया में अंकोरवाट का दुनिया का सबसे विशाल मंदिर है। वियतनाम में 21 शिव मंदिरों के अवशेष मिलते हैं। इतनी जीवंत संस्कृति का स्नोत क्या रहा? यह स्नोत है भाषाओं, भूगोल, खान-पान के भेदों से ऊपर हिमालय से दक्षिण सागर तक के जनमानस की ज्ञान-जनित चैतन्य की एकात्मता। यह एकात्मता आस्था की एकात्मता है जो पूरे देश में उत्सव, उपवास और उपासना का रूप लेती है। इस एकात्मता का सर्वोपरि मूल्य है त्याग।

भारत का जनमानस उन युगपुरुषों की उपासना करता है जो त्यागमूर्ति हैं

भारत का जनमानस उन युगपुरुषों की प्रतीकों के रूप में उपासना करता है जो त्यागमूर्ति हैं। चाहे वह महात्मा बुद्ध हों या महावीर या गुरुनानक। इस संपूर्ण शृंखला की पहली कड़ी हैं-अवतार पुरुष भगवान राम। वह एक गृहस्थ सामाजिक पुरुष होते हुए भी त्याग की र्मूित के रूप में भारतीय जनमानस में उतरकर स्थापित हो गए। जैसे हनुमानजी ने सीताजी को अपने हृदय में राम को प्रत्यक्ष स्थापित दिखाया उसी प्रकार भारत का हृदय राममय है। इस प्राचीन सभ्यता के पर्याय हैं राम। देश के अनेक हिस्सों में एक-दूसरे को अभिवादन ‘राम-राम जी’ से करते हैं। हर व्यक्तिगत, सामाजिक, प्रत्याशित, अप्रत्याशित स्थिति में रामनाम ही कंठ से निकलता है।

सांसों में बसे राम, रामायण तो एक ही है-वाल्मीकि की, परंतु राम कथा अनंत है

सांसों में ऐसे बसे हुए हैं राम। सदियां बीत गईं। कई उत्थान-पतन हो गए, परंतु राम-नाम और राम कथा प्रगाढ़ता से लोक के जनजीवन में जीवन-मूल्यों के दृष्टांत के रूप में स्थिर है। रामायण तो एक ही है-वाल्मीकि की, परंतु राम कथा अनंत है, पर किसी भी राम-कथा का श्रवण कीजिए, राम एक आदर्श पुरुष रूप में हमारी मानसिकता में समावेशित हो जाते हैं। राम संपूर्ण भारतीय संस्कृति और मूल्यों के प्रतीक हैं। एक सौम्य राम हैं, एक धनुर्धारी राम हैं, एक भक्त के भक्त राम हैं जो शबरी के बेर खाते हैं, एक राम लक्ष्मण मूर्छा पर विलाप करते हैं, एक राम अहिल्या का उद्धार करते हैं। अर्थात राम (हरि) अनंत, हरि कथा अनंता।

राम की स्तुति पुराण, शास्त्र, अनेक संप्रदाय और ऋषि-मुनि करते हैं 

राम की स्तुति पुराण, शास्त्र, अनेक संप्रदाय और ऋषि-मुनि करते हैं। भारत-भूमि पर प्रतीक रूप में उनकी विग्रह रचना एवं मूर्तिरूप स्थान-स्थान पर मिलते हैं। हर परिवार में उनकी और रामदरबार की दीया-बाती होती है। उनकी जीवन लीला हर नगर, गांव में हर वर्ष प्रकट की जाती है। जन्म से मरण तक उनका नाम ही व्यक्ति का सहारा है। भारत में लाखों रामपुर, रामगांव और करोड़ों रामकुमार हैं। रामनवमी एवं दशहरा, दीवाली का त्योहार उनके लिए ही मनाया जाता है। उनकी पूजा-अर्चना असंख्य राम-स्तुतियों से होती है। वह स्थान जहां उन्होंने अवतार रूप में जन्म लिया, वह अयोध्याजी की रामजन्मभूमि उनके करोड़ों भक्तों के लिए सबसे पुण्य तीर्थ स्थान है। वह रामजन्मभूमि राम की ही नहीं, भारत की सांस्कृतिक-सभ्यता की अविरल धारा का प्रतीक है। उस जन्मभूमि पर प्राचीन काल से रामलला को विराजमान करने के लिए कोई न कोई भव्य मंदिर रहा है। बाहरी आक्रांताओं ने उसका बार-बार विध्वंस किया और बार-बार उसका पुनर्निर्माण किया गया।

धर्म की रक्षा शास्त्र और शस्त्र, दोनों से होती है

धर्म की रक्षा शास्त्र और शस्त्र, दोनों से होती है। इसीलिए गुरु गोविंद सिंह जी ने दो तलवारें पहनी-मीरी तथा पीरी और शास्त्र रचना के साथ खालसा पंथ की स्थापना की। गुरुनानक देव जी, गुरु तेगबहादुर जी तथा गुरु हरगोविंद सिंह जी ने रामजन्मभूमि जाकर पूजा अर्चना की और जय श्रीराम का उद्घोष किया। ब्रिटिश काल में श्रीरामजन्मभूमि की मुक्ति से संबंधित पहली एफआइआर 1858 में निहंगों के खिलाफ हुई जिन्होंने वहां हवन किया और जय श्रीराम की गर्जना की कि स्वतंत्रता स्वतंत्रता नहीं यदि देशवासी अपनी आस्था-भूमि पर अपने आराध्यदेव को विराजमान नहीं कर सकते। आज जब राम मंदिर की पहली ईंट रखी जाएगी तब वह भारत की संस्कृति और सभ्यता की स्वतंत्रता का क्षण होगा।

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