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कोरोना संक्रमण के विरुद्ध सहायक सिद्ध हो सकते हैं भगवान श्रीकृष्ण के सुविचार व सूत्र

Janmashtami 2020 आज युद्ध कोरोना संक्रमण के विरुद्ध है। इसमें विजयी होने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं भगवान श्रीकृष्ण के सुविचार व सूत्र। निराशा के बीच आशा की किरण बन सकते हैं उनके द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता में दिए उपदेश तथा जीवन आचरण। जब जब मैं इस श्लोक को गुनगुनाता हूं तो मेरा मनस इस श्लोक के आखिरी शब्द ‘जगत्गुरुम्’ पर ठहर जाता है। एक प्रश्न और अनंत उत्तर, कौन दे सकता है, वही ‘जगत्गुरुम्’। यह वही हो सकता है जिसकी कथनी और करनी हजारों-हजार साल के बाद भी सार्थक हो, अनुकरणीय हो, अनुगमनीय हो।

एक बात इस समय कहनी बड़ी सार्थक लगती है कि हर युग, हर काल में, जब भी हमारा परिचय श्रीकृष्ण से होगा, वो हमें सदा पूर्णता के प्रतीक के रूप में ही दिखेंगे। श्रीमद्भागवत में कहा जाता है- ऐते चांशकला: पुस: कृष्णस्तु भगवान स्वयं। सारे अवतार या तो अंशावतार हैं, कलावतार हैं या आवेशावतार हैं। श्रीकृष्ण केवल कृष्णस्तु भगवान स्वयं साक्षात स्वरूप हैं और जब हम श्रीकृष्ण की अनंत लीलाओं का श्रवण करते हैं तो वहां हमें एक सहजता दिखती है, स्वाभाविकता दिखती है। यही लीला हो जाती है।

त्याग दें संशय का भाव: समूचा विश्व इस समय कोविड काल से गुजर रहा है। सभी पर्व, महोत्सव आदि कोविड-19 की छाया से ग्रसित हुए हैं। इस समय ऐसा कोई पहलू नहीं जो इससे प्रभावित और प्रताड़ित न हुआ हो। क्या शिक्षा, क्या व्यापार, क्या स्वास्थ्य, क्या परिवार, क्या संबंध, क्या धर्म, अनगिनत पहलू हैं! श्रीकृष्ण के ऐसे कौन से संदेश हैं जो इस कोरोना काल में सार्थक साबित होंगे और मानवजाति को संबल प्रदान करेंगे? कुछ पहलू ऐसे हैं जिन पर प्रकाश डालना आवश्यक है- सबसे पहले बात करूंगा ‘संशय’ की। भविष्य कोरोना काल में संशय से भरा है और संशय कब पैदा होता है? जब मन विषादग्रस्त हो। यही विषाद सबसे पहले अर्जुन के मन में पकड़ा था श्रीकृष्ण ने। यह श्रीकृष्ण जन्माष्टमी ऐसे ही न जाने दें। अपने संशयों को श्रीकृष्ण के साथ साझा करें। वह महाभारत का युद्ध था और आज युद्ध कोरोना संक्रमण के खिलाफ है और कभी भी किसी भी युद्ध में संशय के साथ नहीं उतर सकते।

इस संशय का समाधान ही गीता है। उस समय संशय हार-जीत का था और आज संशय जीवन- मृत्यु का है। आपका संशय भय पैदा करता है। यह संशय अंतर की यात्रा पर नहीं जाता, प्रश्न नहीं उठाता। आपमें और अर्जुन में कोई अंतर नहीं। अर्जुन का नाम ऋजु धातु से बना है। ‘ऋजु’ का अर्थ होता है सीधा और समझना। अर्जुन का अर्थ हुआ जो सीधा नहीं टेढ़ा है। कृष्णं वंदे जगत्गुरुम् के सामने हम सब टेढ़े ही हैं। ऐसे में समर्पण की आवश्यकता है। वह तभी होता है जब गोविंद विराट स्वरूप के दर्शन कराते हैं, पर विराट स्वरूप का आज के परिप्रेक्ष्य में क्या मतलब है? सारे विरोधाभासों के साथ इकट्ठे हो जाना। जहां जन्म-मरण एक साथ मौजूद हो, उत्पत्ति और विसर्जन एक साथ दिखाई पड़ता है, बीज और वृक्ष जहां एक साथ, प्रलय और सृजन भी एक साथ हों। वह विराट ही तो है जो प्रत्यक्ष पल-पल मौजूद है पर फासले के कारण दिखाई नहीं पड़ता और हमारे चक्षुओं में तो संसार बसा पड़ा है, संशय भरा हुआ है। इसी कारण विराट का दूसरा छोर दिखता ही नहीं।

धैर्य को बनाएं अस्त्र: दूसरा सूत्र है ‘धैर्य’- संशय में धैर्य मत खोना। धैर्य तो प्रकृति का स्वभाव है। बीज को धरती में डालो तो धैर्य धारण करना ही पड़ता है। विचार भी धैर्य से ही कर्म बनता है। पांडवों को भी धैर्य धारण करना पड़ा। धैर्य में बड़ी अभीप्सा है, धैर्य प्रार्थना से प्रारंभ होता है और प्रतीक्षा में पूर्ण। कोरोना काल में भी हर खबर हमें अधैर्य करती है, पर इस पल जरा सोचें, जैसे श्रीकृष्ण बड़े प्रेम से कहते हैं- धैर्य रखो, जो एक दिन बढ़ेगा, वह एक दिन अवश्य घटेगा। ऊंचे से ऊंचे पहाड़ के निकट ही गहरी खाई होती है। सारे उतार-चढ़ाव एक साथ हैं। कोरोना काल में शत्रु को पहचानो, समझो, जानो और उसके हिसाब से अपने जीवन और जीवनशैली में परिवर्तन लाओ। जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि हे कृष्ण! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर खड़ा करिए, तो वह इसलिए नहीं कि संधि कराएं या बातचीत कराएं। अर्जुन संवेदनशील थे, वह देखना चाहता थे कि युद्घ करने कौन-कौन आए हैं, पर इस कोरोना काल में शत्रु आपकी आंख से नहीं दिखता। उसके अस्त्र-शस्त्र नहीं दिखते। इस जगत में या इस काल में, वास्तव में खबर, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आदि ही आपके आंख और कान बन गए हैं। केवल संक्रमित करना ही इस कोरोना संक्रमण के अस्त्र-शस्त्र हैं और घर में रहना, उचित दूरी बनाना और संक्रमित होने से बचना हमारे-आपके अस्त्र-शस्त्र। यही असल युद्ध है। महाभारत में युद्ध कुरुक्षेत्र में बाहर था, यहां कुरुक्षेत्र आपकी अपनी देह ही है। ऐसे में धैर्य रखना अति आवश्यक है।

अभयं सत्त्वसंशुद्धिज्र्ञानयोगव्यवस्थिति:।

दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥

श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव, अंत:करण की पूर्ण निर्मलता, तत्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरंतर दृढ़ स्थिति और सात्विक दान, इंद्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्ट सहना और शरीर तथा इंद्रियों के सहित अंत:करण की सरलता, हे अर्जुन! ये सब दैवी संपदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं॥

सबकी बराबर है भूमिका: मुझे महाभारत के युद्ध के दौरान कृष्ण की एक लीला का स्मरण होता है। महाभारत का युद्ध चरम पर था। श्रीकृष्ण सारथी हैं, अर्जुन हर तरफ से आते बाण प्रहारों को रोकते अपने युद्ध कौशल और धर्नुविद्या से रणभूमि में हाहाकार मचा रहे हैं। एकाएक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, ‘हे पार्थ! मेरे घोड़े थक गए हैं, पसीना पानी की भांति बह रहा है। मुझे मेरे अश्वों को जल पिलाना पड़ेगा।’ अर्जुन ने कहा, ‘सखा, इस समय विषम परिस्थिति है। हम रथ रोक नहीं सकते’, पर जब तक अर्जुन आगे बोल पाते, श्रीकृष्ण ने रथ रोका और अपने पीतांबर से अश्वों के पसीने को पोंछने लगे। उनको थपथपाने लगे। अर्जुन के ऊपर एक साथ बाणों की बरसात होने लगी। वह श्रीकृष्ण को पुकारने लगे, लेकिन श्रीकृष्ण ने कहा, ‘हे पार्थ! मेरे अश्वों को कुछ जल और विश्राम, हौसला न दिया, प्रेम न दिया तो ये यहीं गिर पड़ेंगे। हमारे इस युद्ध में जो भूमिका तुम्हारी है, उतनी ही महत्वूपूर्ण भूमिका इनकी भी है। हम सब बराबर हैं।’ बस थोड़ी ही देर में श्रीकृष्ण पुन: रथ पर चढ़ गए और इस लीला से उन्होंने यह संदेश दिया कि हमारी जीवनधारा में राज्य हो, व्यापार हो, युद्ध हो या कोई भी पल हो, हमेशा जिनकी वजह से सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा हो, उन सबका ख्याल रखना, क्योंकि हर व्यक्ति इस जीवन यज्ञ में अपना किरदार निभा रहा है। वही सबसे उत्तम नायक है।

समर्पण का भाव है आवश्यक: श्रीकृष्ण हुए अतीत में हैं, पर सदा हैं भविष्य के। आज के परिदृश्य में श्रीकृष्ण समर्पण की बात अवश्य करते, पर कौन सा समर्पण? इस बार समर्पण कहीं बाहर नहीं अपितु अपने प्रति, अपने प्रत्येक कर्म के प्रति, स्वास्थ्य के प्रति, परिवार के प्रति, देश के प्रति है। हमें कोरोना काल में परिस्थिति के प्रति समर्पित नहीं होना, पर अपने दायित्वों की जिम्मेदारी की तरफ समर्पण करना है। यही समर्पण का भाव ही सच्ची सेवा है। हर प्रबंधन गुरु एक सूत्र देता है, वह सूत्र समाज का सूत्र हो जाता है। इस कोविड काल में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विश्व के सबसे बड़े प्रबंधन गुरु श्रीकृष्ण होते तो क्या सलाह देते? यही कि ‘बचाव ही इलाज है।’ यही हमारा इस बार की जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण के प्रति सच्ची भक्ति और सच्ची श्रद्धा का अभिषेक होगा। इस बार जन्माष्टमी अपने घर पर ही रहते हुए ऐसी मनाएं कि ब्रज का भाव जीवनशैली बन जाए।

हमारे श्री राधारमण मंदिर में जब श्री राधारमण देव जू दर्शन देते हैं तो भी मंगल होता है और जब पट बंद होते हैं तो भी कोई नहीं कहता है कि पट बंद हैं। सब यही कहते हैं कि अभी मंदिर मंगल है। श्रीकृष्ण को अपने भक्त अति प्रिय हैं और इस जन्माष्टमी पर भी वे सभी भक्तों को उनकी भावभक्ति के माध्यम से दर्शन देंगे। अभी तक हम मंदिर और तीर्थ जाते थे, मगर इस जन्माष्टमी अपने घर को तीर्थ और मन को मंदिर बना लें कि श्रीकृष्ण सदैव वास करें। बोलिए कृष्ण कन्हैया लाल की जय!

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