Cover

अभिव्यक्ति की आजादी पर दोहरे मानदंड: विचार अभिव्यक्ति की मर्यादा से भूषण पीछे हटने के मूड में नहीं

स्वतंत्र न्यायपालिका भारतीय संविधान का आधारिक लक्षण है। संविधान निर्माताओं ने इसकी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए कई रक्षोपाय किए थे। उसके साथ विधायिका और कार्यपालिका संवैधानिक व्यवस्था के तीन प्रमुख स्तंभ हैं। बीते दिनों वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना का आरोप सही पाया गया।

सर्वोच्च न्यायालय के छह वर्ष के कामकाज पर हमला

शीर्ष अदालत ने कहा कि भूषण की टिप्पणियां केवल एक-दो जजों पर हमला नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के पिछले छह वर्ष के कामकाज पर हमला हैं। कोर्ट ने कहा, ‘यदि ऐसे हमलों से सख्ती से नहीं निपटा गया तो विश्व बिरादरी में राष्ट्रीय सम्मान और गरिमा पर प्रभाव पड़ सकता है। न्यायपालिका के प्रति आम जनता का विश्वास भी कम होगा।’ फैसले के बाद भूषण के पक्षधर तमाम टिप्पणियां कर रहे हैं। माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट के कामकाज पर स्वतंत्र बहस को बाधित करने वाला बताया। कुछेक टिप्पणीकार अवमानना कानून को ही व्यर्थ बता रहे हैं तो कई फैसले के पक्ष में भी हैं। खासी बहस चल निकली है।

भाकपा महासचिव डी राजा ने कहा- असहमति और विचार भिन्नता लोकतंत्र के अंग हैं

भाकपा महासचिव डी राजा ने कहा है, ‘असहमति और विचार भिन्नता लोकतंत्र के अंग हैं।’ बेशक यह बात सही है, लेकिन किसी टिप्पणी को न्यायिक सुनवाई के बाद अवमानकारी घोषित करना न्यायालय का विधिक अधिकार है जो किसी दल ने नहीं दिया। राजा ने अवमानना कानून के पुनरीक्षण की मांग की है। उन्हें इसके लिए विधायिका के मंच का उपयोग करना चाहिए। तृणमूल कांग्रेस की सांसद मोइत्रा ने भी ऐसी ही टिप्पणी की है। ऐसी बयानबाजी राजनीतिक आरोपों जैसी है। इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

न्यायिक फैसलों पर सियासी बयानबाजी का चलन बढ़ा

न्यायिक फैसलों पर सियासी बयानबाजी का चलन बढ़ा तो छोटी-बड़ी सभी अदालतों के फैसलों की आलोचना की परंपरा का विस्तार होगा। लोग न्यायाधीशों की भी आलोचना करेंगे। तब देश की विधि व्यवस्था का क्या होगा? क्या ऐसे में न्यायाधीश अपना दायित्व शांत चित्त मनोदशा में पूरा कर पाएंगे? यह गलत परंपरा की शुरुआत है। दलों को न्यायिक संस्थान की गरिमा गिराने वाला काम नहीं करना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी पर दोहरे मानदंड उचित नहीं। अवमान कार्रवाई की आलोचना करने वाले बड़ी भूल कर रहे हैं। भूषण ने स्वयं 2017 में हाईकोर्ट के एक जज सीएस कन्नन के विरुद्ध ऐसी कार्रवाई को उचित बताया था। कन्नन ने भी सुप्रीम कोर्ट के जजों पर टिप्पणियां की थीं।

संवैधानिक संस्थाओं के प्रति लोगों के भरोसे के कारण ही जनतंत्र और संविधान का शासन चलता है

सर्वोच्च न्यायपीठ, न्यायपालिका और सभी संवैधानिक संस्थाओं के प्रति भारत के लोगों के भरोसे के कारण ही जनतंत्र और संविधान का शासन चलता है। इस भरोसे को बनाए रखना न्यायपालिका की भी जिम्मेदारी है। आलोचकों की भी। उन्हें सुनवाई के तथ्यों पर भी ध्यान देना चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने दलील दी, ‘भूषण के ट्वीट न्यायपालिका के विरुद्ध नहीं थे। वे न्यायाधीशों की क्षमता के तहत निजी आचरण को लेकर थे।’ भूषण की प्रशंसा में दवे ने कहा, ‘उन्होंने न्यायशास्त्र के विकास में बड़ा योगदान दिया है। अदालत ने भी 2-जी, कोयला खदान आवंटन जैसे मामलों में उनके योगदान की सराहना की है।’ कोर्ट ने स्वयं उन्हें न्यायिक प्रक्रिया का साझेदार बताकर कहा कि इसीलिए उनके ट्वीट और भी गंभीर है।

भूषण मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार के तर्क

भूषण मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार के तर्क दिए जा रहे हैं। बेशक यह जनतंत्र का मूलाधार है, लेकिन संविधान निर्माताओं ने इसे असीम नहीं बनाया। अनु. 19(1)ए 8 में वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, लेकिन इसी के खंड-2 में इसका संयम है कि उपरोक्त खंड 1 की कोई बात प्रदत्त अधिकार के प्रयोग पर भारत की संप्रभुता, अखंडता, राज्य की सुरक्षा, वैदेशिक संबंध, लोक व्यवस्था, न्यायालय अवमान और अपराध प्रेरण पर विधिक कार्रवाई या नई विधि बनाने से भी नहीं रोकेगी। मूलभूत प्रश्न है कि क्या बेंगलुरु के पी नवीन की आपत्तिजनक टिप्पणी को भी विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मान सकते हैं? इसी तरह क्या मेरठ के कथित समाजसेवी शाहजेब रिजवी की ओर से नवीन का सिर काटने की घोषणा को भी विचार अभिव्यक्ति कहेंगे?

विचार अभिव्यक्ति की भी मर्यादा है, भूषण विधिवेत्ता हैं, फिर भी पीछे हटने के मूड में नहीं

विचार अभिव्यक्ति की भी मर्यादा है। भूषण विधिवेत्ता हैं। अवमान नोटिस के बाद उन्होंने अपने ट्वीट का विवेचन किया होगा। तब भी वह पीछे हटने के मूड में नहीं आए, लेकिन उनके पैरोकार सर्वोच्च न्यायपीठ के फैसले के विरुद्ध टिप्पणियां कर रहे हैं। ऐसी टिप्पणियां करने वाले दोहरे मानदंड का ही परिचय दे रहे हैं।

न्यायपालिका की आलोचना में गंभीर संयम और मर्यादा की जरूरत होती है

संवैधानिक जनतंत्र संस्थाओं से चलता है। संस्थाओं के उत्कृष्ट कामकाज से जनविश्वास बढ़ता है। राजनीतिक कार्यपालिका की आलोचना होती है। ऐसा होना भी चाहिए। विधायिका की भी आलोचना होती है। इसमें कभी-कभी संसद या विधानमंडल को भी बकवास कह दिया जाता है। विधायिका को भी अवमान की सुनवाई के अधिकार हैं। न्यायपालिका की आलोचना में गंभीर संयम और मर्यादा की जरूरत होती है। कोई भी व्यवस्था आदर्श नहीं होती। उसमें सुधार की गुंजाइश रहती है।

न्यायपालिका जवाबदेही का कोई तंत्र विकसित नहीं कर पाई

कार्यपालिका विधायिका के प्रति जवाबदेह है। विधायिका के सदस्य जनता के प्रति उत्तरदायी हैं, लेकिन न्यायपालिका अपने भीतर जवाबदेही का कोई तंत्र विकसित नहीं कर पाई। उत्तरदायित्वविहीन व्यवस्था में गतिशीलता नहीं होती। तब भी संवैधानिक संस्थाओं पर हमले से लोकतंत्र के प्रति जनविश्वास घटता है। आमजन इन संस्थाओं को भी शक की निगाह से देखने लगते हैं। संस्थाओं के प्रति अविश्वसनीयता का माहौल अनुचित है। भूषण के पैरोकार ऐसा ही कर रहे हैं। न्यायिक कार्यवाही के परिणाम हमेशा हमारे मनोनुकूल ही नहीं होते। फैसले को शिरोधार्य करना या अपील में जाना ही श्रेयस्कर होता है।

न्यायाधीशों या कोर्ट की आलोचना में उदारता दिखानी चाहिए

इस प्रसंग में उदारता की बातें भी चली हैं। कोर्ट ने भी कहा है कि न्यायाधीशों या कोर्ट की आलोचना में उदारता दिखानी चाहिए, पर ऐसी उदारता नहीं कि न्यायपालिका की नींव पर होने वाले दुर्भावनापूर्ण हमले से वह निपट न सके।

भूषण बेहतर जानते हैं कि कोर्ट के विरुद्ध राजनीतिक प्रकृति की बयानबाजी अनुचित है

भूषण सारी बातें बेहतर जानते हैं। उन्हें यह भी पता है कि कोर्ट के विरुद्ध राजनीतिक प्रकृति की बयानबाजी अनुचित है। वह तो खुद न्याय व्यवस्था का हिस्सा हैं। अवमानना का यह पहला मामला नहीं है।

कोर्ट का आदेश न मानने पर अवमानना के मामले चलते हैं

कोर्ट का आदेश न मानने पर भी अवमानना के मामले चलते हैं। बेशक यह मामला भिन्न प्रकृति का है, मगर कन्नन का अवमान मामला ऐसा ही था और वह उसका समर्थन कर चुके हैं।

एक जैसे मामलों में दो मानदंड नहीं हो सकते

एक जैसे मामलों में दो मानदंड नहीं हो सकते। भूषण के पैरोकारों की टिप्पणियां न्यायपालिका की विश्वसनीयता घटाने वाली हैं। संवैधानिक जनतंत्र के लिए यह शुभ नहीं।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Privacy & Cookies Policy