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सरकार और सेना के खिलाफ कोई बोला तो उसका नहीं रहेगा नामो-निशान, पाकिस्‍तान का काला सच

जिनेवा। पाकिस्‍तान पूरी दुनिया में एक आतंकी देश के रूप में जाना जाता है। पूरी दुनिया में उसके यहां से आतंकवाद को इंपोर्ट किया जाता रहा है। पाकिस्‍तान की जमीन से ट्रेनिंग लेने वाले आतंकी दुनिया के कई देशों में हुए हमलों में शामिल रहे हैं। इन आतंकियों को सेना और सरकार का पूरा साथ मिलता है। इनकी वजह से यहां के स्‍थानीय लोगों को कई तरह की परेशानियों और डर के साए में जीना पड़ता है। जो कोई भी सरकार-सेना के खिलाफ आवाज उठाता है उन्‍हें सरकार-सेना और आतंकी मिलकर रास्‍ते से हटा देते हैं। पाकिस्‍तान में ऐसे कई मामले हैं। बलूच, पश्‍तून, सिंधी हजारों की तादाद में आज तक गायब हैं। इन लोगों का कसूर था कि इन्‍होंने अपने यहां पर सरकार-सेना की ज्‍यादतियों के खिलाफ आवाज उठाई थी। इनमें से ही एक हैं इदरिस खटक।

इदरिस खटक एमनेस्‍टी इंटरनेशन के कार्यकर्ता हैं। उन्‍हें 13 नवंबर को पुलिस ने हिरासत में लिया था। इसके बाद से ही उनका कुछ पता नहीं है। उनके परिजन उनका पता लगाने की हर संभव कोशिश कर चुके हैं। इसको लेकर वो पुलिस और प्रशासन के लगातार चक्‍कर काट रहे हैं, लेकिन इदरिस का कुछ पता नहीं चल सका है। अब उनके इस तरह से लापता होने पर यूएन ने भी चिंता जाहिर की है। संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने पाकिस्तान सरकार से इदरिस खटक की इस तरह से हुई गुमशुदगी से पर्दा हटाने की अपील की है। मानवाधिकार विशेषज्ञों ने उनके जीवन को लेकर भी चिंता जाहिर की है।

इदरिस पाकिस्तान के संघीय प्रशासित कबायली इलाकों में जबरन गायब लोगों के हक के लिए पुरजोर आवाज उठाते रहे हैं। 16 जून 2020 को पाकिस्तानी अधिकारियों ने पहली बार स्वीकार किया था कि इदरीस खटक उनकी हिरासत में हैं। उनकी तरह से ये जानकारी इदरिस के गायब होने के सात माह बाद सामने आई थी। हालांकि इन अधिकारियों की तरफ से ये जानकारी नहीं दी गई कि वो कहां पर हैं। यूएन के मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तानी अधिकारियों को इदरिस खटक को न्यायालय के सामने पेश करना होगा और उनका निष्पक्ष मुकदमा चलाना होगा। एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच के भी सलाहकार रह चुके हैं। इन विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि पाकिस्‍तान मानवाधिकारों के उल्‍लंघन के खिलाफ आवाज उठाने वालों के गायब होने के कई मामले सामने आ चुके हैं। उनके मुताबिक इदरिस के स्वास्थ्य और उनके पते-ठिकाने के बारे में कोई जानकारी नहीं होना दरअसल किसी को जबरन गायब किये जाने के अपराध की श्रेणी में आता है। उन्‍होंने ये भी कहा है कि इदरिस के मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।

विशेषज्ञों ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि पाकिस्‍तान में मानवाधिकार कार्यकता इदरिस से उनके परिजनों या उनके वकील से भी मिलने की इजाजत नहीं दी गई है। इदरिस की स्वतंत्र और निष्पक्ष डॉक्टर से मेडिकल टेस्‍ट नहीं किया गया है। पाकिस्तान की सरकार ने इदरिस पर सरकारी गोपनीय अधिनियम और सेना अधियनियम के तहत आरोप लगाए हैं। यूएन के मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्‍तान की सरकार ने इस तरह के कानून को इन जैसे हजारों कार्यकर्ताओं की आवाज दबाने के लिए कई बार इस्‍तेमाल किया है। इनका ये भी कहना है कि पाकिस्‍तान अपने यहां पर मानवाधिकारों का उल्‍लंघन कर रहा है। गौरतलब है कि पेशावर हाई कोर्ट ने इदरिस का बंदी प्रत्यक्षीकरण मामला ये कहते हुए खारिज कर दिया था कि ये उसके न्यायाधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। वहीं इस तरह के मामलों की जांच करने वाली संयुक्त जांच ट्राइब्यूनल ने इदरिस के मामले को यह कहते हुए बंद कर दिया कि वो लापता व्‍यक्तियों की श्रेणी में नहीं आते हैं। आयोग की तरफ से इस संबंध में कोई सिफारिश भी नहीं दी गईं और न ही कोई मुआवजा देने का ही आदेश दिया गया।

यूएन विशेषज्ञों ने मांग की है कि इदरिस को इस तरह से मनमाने तरीके से हिरासत में लिए जाने की जांच की जानी चाहिए और इसके दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए, जिससे देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं समेत आम जनका का डर खत्‍म हो सके। इनके मुताबिक इदरिस को और उनके परिवार को न्याय पाने, पुनर्वास और मुआवजा पाने का अधिकार है।

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