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गुल खिला गई एम्स से निकली एक चिट्ठी, लालू-रघुवंश के रिश्तों में दरार से गरमाई बिहार की सियासत

पटना। चिट्ठी जश्न भी मनवाती है और मातम भी। दिल्ली एम्स के आइसीयू से निकली एक चिट्ठी ने बिहार में ऐसा ही गुल खिलाया है। चिट्ठी से लालू परेशान हैं तो एनडीए मस्त। बेटों के चक्कर में लालू का चालीस साल का रिश्ता दरक गया राजद के कद्दावर नेता रघुवंश बाबू से। जबकि एनडीए बाबा का अपमान बता वह इसे भुनाने निकल लिया है। अब एनडीए के पास मोदी की सभाएं हैं, नीतीश के काम हैं और रघुवंश प्रसाद की चिट्ठी है। लोजपा के शांत पड़ रहे तेवर भी उसके लिए मुफीद हो चले हैं। नफा-नुकसान के चुनावी खेल में एनडीए बढ़त बनाता दिख रहा है।

रघुवंश प्रसाद ने लालू से 32 साल पुराना नाता तोड़ा: रघुवंश प्रसाद दिल्ली एम्स के आइसीयू में भर्ती हैं। वे लंबे समय से लालू के बेटों, तेजस्वी व तेजप्रताप के रुख से आहत थे। छोटे तेजस्वी उनके विरोधी रामा सिंह को राजद में लाने पर तुले थे तो बड़े तेजप्रताप की अनर्गल टिप्पणी (एक लोटा पानी से तुलना) भूले नहीं भूल रही थी। रांची रिम्स अस्पताल में सजा काट रहे लालू भीतर से बैलेंस करने में जुटे थे। इधर सब ठीक दिख रहा था कि अचानक गुरुवार को बिस्तर पर पड़े-पड़े रघुवंश प्रसाद ने लालू से 32 साल पुराना नाता तोड़ने की चिट्ठी बाहर भेज दी। वह भी उस समय जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार की जनता को संबोधित कर रहे थे।

मनरेगा से किसानों को लाभ पहुंचाने के सुझाव: एम्स से निकली बात थोड़ी देर में लालू तक पहुंच गई। लालू इसे 40 साल का रिश्ता मानते हैं। उन्होंने नाता बनाए रखने की चिट्ठी लिख दी, लेकिन उनकी चिट्ठी असरदार नहीं रही, क्योंकि अगले ही दिन रघुवंश प्रसाद ने तीन चिट्ठी लिखकर नीतीश को पुरानी लीक का हवाला देते हुए 26 जनवरी को वैशाली में झंडारोहण करने, बुद्ध के भिक्षापात्र को लाने व मनरेगा से किसानों को लाभ पहुंचाने के सुझाव दे डाले। अब रघुवंश प्रसाद सक्रिय राजनीति में रहें या न रहें, लेकिन इस चुनाव में प्रासंगिक हो चले हैं। उनके हटने से रामा सिंह का राजद में प्रवेश भले ही आसान हो गया, लेकिन राघोपुर से तेजस्वी की राह कठिन हो गई है, क्योंकि यह रघुवंश प्रसाद और राजद छोड़ने वाले एक और पूर्व मंत्री भोला राय का क्षेत्र है।

PM मोदी के संवाद की कला का कोई सानी नहीं: इसी हलचल के बीच दोबारा सत्ता की राह आसान बनाने में जुटे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ अब मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उतर आए हैं। चार हजार करोड़ के उद्घाटन व शिलान्यास के बहाने 23 सिंतबर तक उनकी छह वर्चुअल सभाएं तय हैं। इसकी शुरुआत गुरुवार से हो गई है। मोदी के संवाद की कला का कोई सानी नहीं है, योजनाएं भले ही ज्यादा की न हो, लेकिन कई वर्गो से जुड़ी हैं और उसके जरिये मोदी ने मन जीतना शुरू कर दिया है। गुरुवार को भी उन्होंने अपने भाषण से पहले पशुपालन उद्योग से जुड़े नई सोच के युवाओं से केवल बात ही नहीं की, बल्कि बुजुर्ग की भांति कई सलाह भी दी। सुनने वालों को केंद्र के काम गिनाए और साथ ही नीतीश की पीठ भी थपथपाते रहे। मोदी के साथ ही भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने भी बिहार में पूरी तरह से चुनावी कमान संभाल ली है। शुक्रवार को दोनों नेता पटना पहुंचे हैं। नड्डा शनिवार को मुख्यमंत्री नीतीश से मिलेंगे। माना जा रहा है कि मुलाकात में सीट बंटवारे के फार्मूले को अंतिम रूप देना है।

नीतीश कुमार के कामकाज को लेकर तल्ख टिप्पणी करने वाले चिराग पासवान फिलहाल इस समय कुछ शांत हैं। समझा जा रहा है कि एनडीए में सबकुछ ठीकठाक हो गया है। हालांकि कुछ दिन पूर्व लोजपा की संसदीय बोर्ड की बैठक में जब 143 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात उठी, तब इस संख्या को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगने लगी थीं। लेकिन राज्यसभा के उपसभापति पद के लिए जदयू के उम्मीदवार हरिवंश के प्रस्तावक बन रामविलास ने इसे कुछ हद तक विराम दे दिया। चिराग की चुप्पी और रामविलास का यह कदम एनडीए की एकजुटता के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन राय बनाने वालों की सोच पर क्या कहा जा सकता है? शुक्रवार की सुबह रामविलास का एक संदेश जैसे ही प्रसारित हुआ कि वे चिराग के हर कदम पर साथ हैं, तो कोई कहने लगा कि राख में अभी भी चिंगारी दबी है, तो कोई कह रहा है कि चिराग के सम्मान को बनाए रखने के लिए ये पिता के शब्द हैं। बहरहाल, अब चुनाव सामने दिखाई दे रहा है। कुछ दिन में साफ हो जाएगा कि किसकी राह किधर होगी?

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