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अयोध्या विवादित ढांचा विध्वंस केस में 30 सितंबर को आएगा फैसला, सभी आरोपितों को मौजूद रहने का आदेश

लखनऊ। अयोध्या में छह दिसंबर, 1992 में विवादित ढांचा विध्वंस मामले में सीबीआई की अदालत 27 साल बाद फैसला सुनाएगी। तब इस मामले में कुल 50 एफआइआर दर्ज हुई थी। तीन जांच एजेंसियों ने मिलकर इसकी विवेचना की। सीबीआई के विशेष न्यायाधीश एसके यादव 30 सितंबर को विवादित ढांचा विध्वंस मामले में फैसला सुनाएंगे। सीबीआइ ने कई चरणों में आरोपपत्र दाखिल कर अभियोजन पक्ष को साबित करने के लिए 994 गवाहों की सूची अदालत में दाखिल की। इसमें विचारण के दौरान 354 गवाह पेश किए गए। मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश सुरेंद्र कुमार यादव ने फैसले के दिन सभी आरोपितों को अदालत में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।

अयोध्या के विवादित ढांचा विध्वंस केस में पूर्व उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री रहे लाल कृष्ण आडवाणी, पूर्व राज्यपाल और यूपी के सीएम रहे कल्याण सिंह, भाजपा नेता विनय कटियार, पूर्व केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश की सीएम रहीं उमा भारती आरोपी हैं। सीबीआई ने इस मामले में 49 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट फाइल की थी, जिसमें से 17 लोगों की मौत हो चुकी है। यानी इस समय विशेष अदालत में 32 आरोपितों के विरुद्ध विचारण हो रहा है, जबकि 17 आरोपियों की मृत्यु हो चुकी है। सीबीआई के वकील ललित सिंह ने बताया कि अदालत ने बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनने के बाद एक सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

कई लोगों ने दर्ज कराई थी एफआइआर : अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस मामले से जुड़े अधिवक्ता केके मिश्र ने बताया कि अयोध्या ढांचा ध्वंस मामले की पहली रिपोर्ट (197/92) इंस्पेक्टर रामजन्मभूमि प्रियंवदा नाथ शुक्ला ने थाना रामजन्मभूमि में 40 लोगों को नामजद करते हुए लाखों अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ दर्ज कराई थी। इसी दिन दूसरी रिपोर्ट (198/92) चौकी इंचार्ज राम जन्मभूमि जीपी तिवारी ने अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ दर्ज कराई थी। इसके अलावा 48 रिपोर्टें मीडिया कर्मियों की ओर से दर्ज कराई गईं।

इनके खिलाफ दाखिल हुआ था आरोपपत्र : अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस मामले की जांच कर रही सीबीआइ ने अपराध संख्या 197/92 की विवेचना करते हुए 40 आरोपितों के विरुद्ध चार अक्टूबर 1993 को विशेष अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (अयोध्या प्रकरण) लखनऊ के समक्ष आरोपपत्र दाखिल किया। इसमें बालासाहेब ठाकरे, लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह, अशोक सिंहल, विनय कटियार, मोरेश्वर सावे, पवन पांडे, बृजभूषण शरण सिंह, जय भगवान गोयल, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, महाराज स्वामी साक्षी, सतीश प्रधान, मुरली मनोहर जोशी, गिरिराज किशोर, विष्णु हरि डालमिया, विनोद कुमार वत्स, रामचंद्र खत्री, सुधीर कक्कर, अमरनाथ गोयल, संतोष दुबे, प्रकाशशर्मा, जय भान सिंह पवैया, धर्मेंद्र सिंह गुर्जर, राम नारायण दास, रामजी गुप्ता, पूर्व विधायक लल्लू सिंह, चंपत राय बंसल, ओम प्रकाश पांडे, लक्ष्मी नारायण दास महा त्यागी, विनय कुमार राय, कमलेश त्रिपाठी, गांधी यादव, हरगोविंद सिंह, विजय बहादुर सिंह, नवीन भाई शुक्ला, रमेश प्रताप सिंह, आचार्य धर्मदेव, आरएन श्रीवास्तव एवं देवेंद्र बहादुर राय को आरोपित बनाया गया था।

इन आरोपितों की हो चुकी है मृत्यु : विनोद कुमार वत्स, राम नरायण दास, लक्ष्मी नारायण दास महात्यागी, हर गोविंद सिंह, रमेश प्रताप सिंह, देवेंद्र बहादुर राय, अशोक सिंहल, गिरिराज किशोर, विष्णुहरि डालमिया, मोरेश्वर सवे, महंत अवैद्यनाथ, महामंडलेश्वर जगदीश मुनि महाराज, बालकुंठ लाल शर्मा, परमहंश रामचंद्र दास, डॉ सतीश कुमार नागर, बाला सहब ठाकरे।

रायबरेली से लखनऊ स्थानांतरित हुआ केस : 1993 में राज्य सरकार ने केस की अग्रिम विवेचना सीबीआइ से कराने की संस्तुति केंद्र सरकार से कर दी। सीबीआइ ने 27 अगस्त 1993 को जांच शुरू की। 24 जनवरी 1994 को रायबरेली की कोर्ट में सीबीआइ ने अनुरोध किया कि इस प्रकरण से संबंधित दूसरा मामला लखनऊ की विशेष अदालत में चल रहा है लिहाजा इस केस को भी लखनऊ की विशेष अदालत को स्थानांतरित कर दिया जाए। जिस पर विशेष अदालत ने जिला जज रायबरेली को सूचित करते हुए मामले को लखनऊ की अदालत भेज दिया।

कल्याण सिंह को नहीं करानी पड़ी थी जमानत : उच्चतम न्यायालय के 19 अप्रैल 2017 के निर्णय के उपरांत पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को छोड़कर अन्य आरोपितों ने लखनऊ की विशेष अदालत में हाजिर होकर जमानत कराई। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा था कि आरोपित कल्याण सिंह मौजूदा समय में राजस्थान के राज्यपाल हैं तथा संविधान के अनुच्छेद 360 के अंतर्गत पद पर रहने के दौरान उनके विरुद्ध अदालती कार्यवाही नहीं की जा सकती। राज्यपाल पद से हटने के बाद उनके हाजिर होने पर सभी आरोपितों के साथ-साथ उनके विरुद्ध भी अदालती कार्यवाही प्रारंभ की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ाई थी समय सीमा : सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने लखनऊ में विवादित ढांचा विध्वंस मामले की सुनवाई करने वाली विशेष सीबीआई अदालत की समय सीमा को 30 सितंबर तक बढ़ा दिया था। अयोध्या मामले में फैसला सुनाने की शीर्ष अदालत की समय सीमा 31 अगस्त को समाप्त हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 19 जुलाई 2019 को अयोध्या मामले में आपराधिक मुकदमे को पूरा करने के लिए छह महीने की समय सीमा बढ़ा दी थी। साथ ही अंतिम आदेश के लिए नौ महीने की समय सीमा भी निर्धारित की थी। इस वर्ष 19 अप्रैल को समय सीमा समाप्त हो गई और विशेष न्यायाधीश ने छह मई को शीर्ष अदालत को पत्र लिखकर समय बढ़ाने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने आठ मई को 31 अगस्त तक की नई समय सीमा जारी की और तब तक फैसला सुनाने के निर्देश दिए थे। हालांकि, अगस्त में शीर्ष अदालत ने फिर से 30 सितंबर तक अंतिम फैसला देने के लिए समय सीमा बढ़ा दी थी।

यह है पूरा मामला : हिंदू पक्ष का दावा था कि अयोध्या में विवादित ढांचा का निर्माण मुगल शासक बाबर ने 1528 में श्रीराम जन्मभूमि पर बने रामलला के मंदिर को तोड़कर करवाया था, जबकि मुस्लिम पक्ष का दावा था कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बनाई गई थी। वर्ष 1885 में पहली बार यह मामला अदालत में पहुंचा था। भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने 90 के दशक में राम रथ यात्रा निकाली और तब राम मंदिर आंदोलन ने जोर पकड़ा। छह दिसंबर, 1992 को कारसेवकों ने विवादित ढांचा तोड़ दिया और तबसे ही यह मामला कोर्ट में चल रहा है।

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