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यूएन आम महासभा में पहली बार गूंजी सऊदी के शाह की आवाज, भाषण भी रहा कई मायनों में खास

नई दिल्‍ली। संयुक्‍त राष्‍ट्र आम महासभा की उच्‍चस्‍तरीय बैठक 22 सिंतबर को शुरू हुई थी। इस बार की आमसभा कई मायनों में खास है। इसके खास होने की पहली बड़ी वजह इस बार इसका 75वां सत्र होना है। दूसरी वजह ये है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र के इतिहास में यह पहला मौका है जब इस आम महासभा की बैठक वर्चुलअ तरीके से हो रही है। कोविड-19 की बदौलत दुनियाभर के राष्‍ट्राध्‍यक्ष अपने प्री रिकॉडेड वीडियो मैसेजेस के जरिए इस बार इस महासभा को संबोधित कर रहे हैं। इसके अहम होने की तीसरी बड़ी वजह सऊदी अरब के शाह सलमान बने हैं।

शाह के संबोधन के तीन खास बिंदु

दरअसल, सलमान बिन अब्‍दुलअजीज अल साउद, वर्ष 2015 में अपने भाई नाएफ बिन अब्‍दुलअजीज के निधन के बाद शाह बने थे। इसके बावजूद उन्‍होंने कभी भी संयुक्‍त राष्‍ट्र की आम महासभा को संबोधित नहीं किया था। इस बार ऐसा पहली बार हुआ कि उन्‍होंने इस महासभा का वर्चुअल तरीके से संबोधित किया। उनके संबोधन के तीन बेहद खास बिंदु रहे। इसमें पहला था इस्‍लामिक देश और आतंकवाद, दूसरा था ईरान और तीसरा था इजरायल। आपको बता दें कि शाह सलमान को कहीं न कहीं देश में हो रहे बड़े बदलावों के लिए भी जाना जाता है। महिलाओं को कई तरह के अधिकार दिए जाने के पीछे जितने क्राउन प्रिंस मोहम्‍मद बिन सलमान हैं उतने ही शाह भी हैं। सलमान शाह बनने से पहले करीब 48 वर्षों तक रियाद के गवर्नर रहे। इसके अलावा वो देश के रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। वर्ष 2012 में उन्‍हें क्राउन प्रिंस घोषित किया गया था। शाह दो पवित्र मस्जिदों के कस्‍टोडियन भी हैं।

महासभा को संबोधित करना अहम घटना

संयुक्त राष्ट्र महासभा को पहली बार संबोधित करते हुए उन्‍होंने अपनी सरकार की बुनियादी नीतियों और सऊदी अरब की अहमियत पर जोर दिया। इसमें उन्‍होंने फिलिस्‍तीनियों को दिए गए अपने वायदे को भी दोहराया और खुद को इस्लाम के सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों का संरक्षक बताया। अपने भाषण में उन्‍होने ईरान पर भी हमला किया और उसको पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने का जिम्‍मेदार भी ठहराया। उनका दिया ये भाषण इसलिए भी काफी मायने रखता है क्‍योंकि विश्‍व बिरादरी में सऊदी के क्राउन प्रिंस जितने एक्टिव दिखाई देते हैं उतने शाह नहीं दिखाई देते हैं। शाह सलमान सार्वजनिक तौर पर कम ही मुद्दों पर बोलने के लिए भी जाने जाते हैं। इसलिए भी उनका संयुक्‍त राष्‍ट्र की आम महासभा में बोलना एक अनोखी घटना है। ऐसा करने वाले वह सऊदी के दूसरे शाह हैं। इससे पहले 1957 में उनके भाई और सऊदी शाह सऊद ने महासभा को संबोधित किया था।

आतंकवाद का खात्‍मा जरूरी

अपने इस भाषण में शाह ने कहा कि इस्‍लामिक वर्ल्‍ड में सऊदी अरब की एक विशेष और ऐतिहासिक जिम्मेदारी बनती है कि हम अपने धर्म को उन आतंकी संगठनों से बचाकर रखें जो इसको बदनाम कर रहे हैं। आपको बता दें कि इस्‍लामिक देशों के संगठन इस्‍लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) में सऊदी अरब की प्रमुख भूमिका है। इस संगठन के 50 से अधिक सदस्‍य देश हैं। हालांकि बीते कुछ समय से पाकिस्‍तान, तुर्की, ईरान और मलेशिया मिलकर एक नया इस्‍लामिक संगठन खड़ा करने की कोशिश में लगे हैं। इस लिहाज से अपने संबोधन में सभी इस्‍लामिक देशों और आतंकवाद की बात कर उन्‍होंने अपनी उसी भूमिका को मजबूती के साथ स्‍थापित करने का भी प्रयास किया है।

इजरायल का मुद्दा

अपने भाषण में उन्‍होंने इजरायल फिलीस्‍तीन का भी मुद्दा उठाया। उन्‍होंने कहा कि फिलीस्‍तीन राष्ट्र के निर्माण से पहले वो इजरायल को मान्यता नहीं दे सकते हैं। इस महासभा में इजरायल से संबंधित बयान बेहद मायने रखता है। दरअसल, अमेरिका और सऊदी अरब के काफी समय से मजबूत संबंध रहे हैं। वहीं अमेरिका और इजरायल की घनिष्‍ठता किसी से भी छिपी नहीं है। हाल ही में अमेरिका की मध्‍यस्‍थता के बाद इजरायल और यूएई में एक एतिहासिक समझौता हुआ था। इसके बाद ऐसा ही समझौता बहरीन के साथ भी हुआ था। जवाहरलाल नेहरू के प्रोफेसर एके पाशा मानते हैं कि ऐसा ही समझौता आने वाले समय में इस क्षेत्र के अन्‍य देशों के साथ भी हो सकता है। इसमें भविष्‍य में सऊदी अरब भी शामिल हो सकता है क्‍योंकि इस क्षेत्र के देशों का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी ईरान है। शाह सलमान खुद मानते हैं कि ईरान को लेकर उनकी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। आपको बता दें कि सऊदी अरब अपने यहां पर हुए कई भीषण हमलों के लिए ईरान को जिम्‍मेदार मानता है। उन्‍होंने अपने संबोधन में ये भी कहा कि ईरान से दोस्‍ती कायम करने की उनकी सारी कोशिशें बेकार साबित हुई हैं।

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